Tuesday, 4 October 2011

गांधी जी व जिन्ना की दुर्लभ फोटो ने खोल दिए कई राज़


 


 
 
 
भागलपुर।महात्मा गांधी और जिन्ना के बीच जो रिश्ते थे, क्या उनमें खटास ज्यादा थी या प्रेम? यह एक ऐसा सवाल है जो देश के लिए हमेशा से ही कठिन सवाल बन कर सामने आता रहा है। लेकिन सवाल की इस मझधार में कुछ दुर्लभ फोटो भी हैं जो यह बतलाते हैं कि इन दोनों के बीच सब कुछ सामान्य था। ऐसी दुर्लभ फोटो को भागलपुर जिले के सबौर युनिर्वसिटी के पुस्तकालय में देखा जा सकता है। गांधीजी के जीवन के सारे अनछुए पहलू जो आज तक एक जगह नहीं देखे जा सके हैं, वह सारा कुछ यहाँ संरक्षित है।
 

दिल्ली से खरीद कर लाया गया था एलबम
 

पुस्तकालय के एलबम में गांधीजी के द्वारा लिखा एक ऐसा संदेश भी है, जिसे पढऩे के बाद गांधीजी की सोच को समझने में असानी होती है। अब अगर इस एलबम की बात करें तो इसको 1950 के आसपास भागलपुर लाया गया था। उस वक्त महाविद्यालय के प्रिंसपल ने अपने छात्रों के लिए दिल्ली से खरीद कर यहां रखा था।


तब से आजतक यह एलबम खास बन गया है, ताकि गांधी के अनछूए पहलुओं को देखकर उनके विचारों को लोग अपना सकें। इस एलबम को बारीकी से देखा व पढ़ा जाय तो गांधीजी की बाल्यावस्था का अनमोल चित्र भी दिख जायेगा जिसमें वो मां की गोद में खेलते दिख रहे हैं। जवान गांधी जब कोट-पैंट पहनते थे तो किस तरह दिखते होगें और जब वो पहली बार स्कूल गये तो उनका स्कूली ड्रेस कैसा था, यह सब तस्वीरों में दिख रहा है। इन सबों के अलावे जब अहिंसा के इस पुजारी ने अपना राजनीतिक जीवन आरंभ किया तो उस समय गांधी की क्या सोच थी। फोटो के साथ पूरा विवरण देखा जा सकता है।
 
 

Monday, 19 September 2011

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भगतसिंह की साहस का परिचय इस गीत से मिलता है जो उन्‍होने अपने छोटे भाई कुलतार को ३ मार्च को लिखा था-

उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।

Saturday, 17 September 2011

वास्तुशास्त्र मुख्य सैद्धांतिक बातें



हम वास्तुशास्त्र की प्रमुख सैद्धांतिक बातों को बतला रहे हैं । इन पर अमल करके बिना तोड़फोड़ किए ही वास्तुदोषों से छुटकारा पाकर जीवन में सुख-समृद्धि लाई जा सकती है ।

* घर का मुख्य द्वार किसी अन्य के घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने न बनाएं ।
* घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाएं और आंगन का कुछ भाग मिट्टी वाला भी रखें ।
* रसोई घर मुख्य द्वार के ठीक सामने न बनाएं । ऐसा होने से अतिथियों का आवागमन होता रहता है ।
* पूजागृह, शौचालय व रसोईघर पास-पास न बनवाएं ।
* विद्युत उपकरण आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में रखें ।
* घर में टूटे-फूटे बतरन, टूटा दर्पण, टूटी चारपाई न रखें । इनमें दरिद्रता का वास होता है ।
* दर्पण, वास बेसिन व नल ईशान कोण में रखें ।
* किसी भी मकान में दरवाजे व खिड़कियां ग्राउण्ड फ्लोर में ही अधिक रखें । उसके बाद प्रथम, द्वितीय मंजिलों में कम करते जाएं ।
* बच्चों के अध्ययन की दिशा उत्तर या पूर्व होती है । यदि बच्चे इन दिशाओं की ओर मुंह करके अध्ययन करें तो स्मृति बनी रहती है
*रात्रि में बर्तन झूठे न रखें ।
* जल निकास उत्तर-पूर्व में रखें ।
* यदि घर में घड़ियां हैं और वे ठीक से नहीं चल रही हैं तो उन्हें ठीक करा लें । घड़ी गृहस्वामी के भाग्य को तेज या मंदा करती है ।
* पूजागृह व शौचालय सीढ़ियों के नीचे न बनाएं ।
* अन्‍नागार, गौशाला, रसोईघर, गुरू स्थल व पूजागृह जहां हो उसके ऊपर शयनकक्ष न बनाएं । यदि वहां शयनकक्ष होगा तो धन-संपदा का नाश हो जाएगा ।
* शयन करते समय सिरहाना पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखने से धन व आयु की बढ़ोत्तरी होती है । उत्तर की ओर सिरहाना रखने से आयु की हानि होती है ।
* घर में सात्त्विक प्रवृत्ति के पक्षियों के जोड़े वाला चित्र रखें । इससे परिवार का वातावरण माधुर्यपूर्ण रहेगा ।
* घर के मुख्य द्वार पर नीबू या संतरे का पौधा लगाएं । ये पौधे संपदा बढ़ाने वाले होते हैं ।
* घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर पौधे लगाएं ।
* परिवार के सदस्यों में माधुर्य भाव बना रहे, इसके लिए सभी सदस्यों का एक हंसमुख सामूहिक चित्र ड्राइंगरूम में लगाना चाहिए ।
* घर में झाडू व पोंछा खुले स्थान पर न रखें । खासकर भोजन कक्ष में झाडू नहीं रखनी चाहिए । इससे अन्‍न व धन की हानि होती है । रात्रि में झाडू को उलटी करके घर के बाहर मुख्य दीवार के सामने रखने से चोरों को भय नहीं रहता ।
* पति-पत्‍नी में माधुर्य संबंधों के लिए शयनकक्ष के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्‍चिम) में प्रेम व्यवहर करते पक्षियों का जोड़ा रखना चाहिए ।
* शौच से निवृत्त होने के बाद शौचालय का द्वार बंद कर दें । यह नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है ।
* दिन में एक समय परिवार के सभी सदस्यों को एकसाथ भोजन करना चाहिए । इससे परस्पर संबंधों में प्रगाढ़ता आती है ।

j.h.khan

Sunday, 11 September 2011

भगत सिंह का अंतिम पत्र


भगत सिंह का अंतिम पत्र


22 मार्च,1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह

Saturday, 10 September 2011


हिमालय के बारे में पहले भी भविष्यवाणियाँ होती रही हैं लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर बने अंतर्देशीय पैनल (आईपीसीसी) की 2007 में प्रकाशित चौथी रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि वर्ष 2035 तक हिमालय के हिमनद पूरी तरह पिघल जाएँगे। हिमालय की 4,500 मीटर से लेकर 5,600 मीटर की ऊँचाइयों पर 33,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हिमनदों में जमा 1,400 घन किलोमीटर बर्फ को लेकर ऐसी खबर ने लोगों को बेहद चिंतित कर दिया। 

इनके विलुप्त होने का मतलब इनसे निकलने वाली सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों और उनकी सैकड़ों सहायक नदियों का खत्म हो जाना था। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई) की 'इन्वेन्ट्री ऑफ ग्लेशियर-2009' के अनुसार हिमालय के भारतीय क्षेत्र में कुल 9,500 हिमनद हैं। 

 इस रिपोर्ट के अनुसार, 'दुनिया के अन्य भागों में स्थित हिमनदों की तुलना में हिमालय के हिमनद तेजी से सिकुड़ रहे हैं और सिकुड़ने की गति यदि यही रही तो ये ग्लेशियर वर्ष 2035 तक समाप्त हो जाएँगे। यदि पृथ्वी इसी गति से गर्म होती रही तो ये हिमनद और भी जल्दी समाप्त हो सकते हैं।' 

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद विश्व समुदाय तथा वैज्ञानिकों में हलचल मचनी स्वाभाविक थी। दुनिया के 2,500 शीर्ष वैज्ञानिकों वाली आईपीसीसी की ख्याति तथा उसे दी गई मान्यता को देखते हुए इस रिपोर्ट को नकारना भी आसान नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार हिमनदों के सिकुड़ने को सीधे-सीधे 'ग्लोबल वार्मिंग' से जोड़ा गया था। 

बहरहाल, हिमालय के हिमनदों पर पिछले एक दशक से संवेदनशील यंत्रों की सहायता से शोध कर रहे भारतीय हिमनद वैज्ञानिकों के आँकड़े कुछ और कह रहे थे। उनका मानना था कि ये हिमनद इतनी तेजी और असामान्य गति से नहीं पिघल रहे हैं!

दूसरी और आईपीसीसी की रिपोर्ट में आँकड़े नहीं दिखाए गए थे और लगता था कि वह पूरी तरह अनुमान पर आधारित है। इस रिपोर्ट को वर्ष 1996 में यूनेस्को की जल विज्ञान पर छपे पत्र तथा वर्ष 1999 में 'न्यू साइंटिस्ट' पत्रिका में छपे एक साक्षात्कार के आधार पर बनाया गया था। 

इस साक्षात्कार में हिमालय के हिमनदों पर काम कर रहे अंतर्राष्ट्रीय कमीशन (आईसीएसआई) के अध्यक्ष डॉ. सैयद इकबाल हसनैन ने बयान दिया था, "हिमालय के अधिकांश हिमनद 40 सालों में समाप्त हो जाएँगे।'  

वर्ष 1996 में रूसी जल विज्ञानी बी.एम. कोटलाव ने भी वर्ष 2350 तक हिमालय के हिमनदों के पिघलकर पाँचवें हिस्से तक रह जाने की घोषणा की थी। महज एक पत्रिका में छपे साक्षात्कार या वर्ष 2350 को वर्ष 2035 लिख देने की गलती को सत्य की खोज और सटीक आँकड़ों के आधार पर कार्य करने वाले वैज्ञानिक समुदाय के एक वर्ग द्वारा जगह-जगह दोहराई जाने लगी। 

देहरादून के वाडिया संस्था के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक बिना झिझक स्वीकार करते हैं कि उस दौरान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से वाडिया संस्थान में जाँच के लिए आने वाले शोधपत्रों में भी इस अवैज्ञानिक तथ्य को दोहराया गया था। अब लोगों की समझ में आ रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के हिमनदों के वर्ष 2035 तक समाप्त हो जाने की यह घोषणा भारत-चीन सहित हिमालय से सटे अन्य देशों को भी इस पारिस्थितिकीय घटना के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराना था। 

इन भ्रांतियों से क्षेत्रीय राजनीतिक अस्थिरता तो आती ही, आर्थिक उठापटक भी होती। क्योटो प्रोटोकॉल को अस्वीकार करने के बाद विकसित देश दरअसल वर्ष 2007 में होने वाले 'बाली सम्मेलन' में कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकासशील देशों की तरफ खिसकाने की तैयारी कर चुके थे। 

कोपेनहेगन में 2009 में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन में तो विकसित देशों ने विकासशील देशों को वर्ष 2020 ‍‍तक 25 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन कम करने की सहमति वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का दबाव भी डाला। पर्यावरण कानून के विशेषज्ञ डॉ. ए. के. कांटू अपने शोधपत्र 'मौसम परिवर्तन के राजनीतिक तथा आर्थिक प्रभाव' में लिखते हैं, 'जीवाश्म और पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा मॉडलों को बनाए रखने के लिए अमेरिका ने तेल की राजनीति से ध्यान भटकाने के लिए मौसम परिवर्तन तथा ग्लोबल वार्मिंग का हौंवा खड़ा किया है।'

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
दीन अस्त हुसैन, दीने-पनाह हुसैन
सरदाद न दाद दस्त, दर दस्ते-यज़ीद
हक़्क़ा के बिना, लाइलाह अस्त हुसैन
-ख़्वाजा साहब

यह कलाम अजमेर शरीफ़ में हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के मज़ार के पास रोशन होने वाले चिरागों के क़रीब लिखा है...यह कलाम हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती साहब का है....

हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती प्रसिध्द सूफ़ी संत हैं। ख़्वाजा साहब का जन्म मध्य एशिया में सीस्तान कस्बे में नौ 9 रजब 530 हिजरी को हुआ था और 6 रजब 633 हिजरी को उनकी वफ़ात (देहांत) हुई. ख़्वाजा साहब के पूर्वज सीस्तान के संजर कस्बे में रहते थे इसलिए उन्हें संजरी भी कहा जाता है। उनके ख़ानदान के ख़्वाजा इसहाक शामी हिरात के समीप चिश्त कस्बे में आकर रहने लगे थे। इस वजह से उन्हें और उनके शिष्य चिश्ती कहलाए। ख़्वाजा साहब का जीवन प्रेम, मानवता और भक्ति का प्रतीक है। ख़्वाजा के मज़ार की वजह से अजमेर शरीफ दुनियाभर में विख्यात है।

Friday, 9 September 2011


पर्यावरण, ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है जो संपूर्ण मानव समाज का एकमात्र महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य भौतिक तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ हैं। यदि मानव समाज प्रकृति के नियमों का भलीभाँति अनुसरण करें तो उसे कभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं में कमी नहीं रहेगी।

वर्तमान युग औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण का युग है।

वर्तमान समय में मनुष्य औद्योगिकीकरण और नगरीकरण में इस तरह से गुम हो चुका हैं कि वह स्वार्थपूर्ति के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन करने लगा है। परिणाम स्वरूप मनुष्य को प्रदूषण, बाढ़, सूखा आदि आपदाओं का सामना करना पड़ता हैं। यदि मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य तत्वों की श्रृंखला का सुरक्षित तरीके से उपभोग करे तो पर्यावरण को संरक्षित रखा जा सकता हैं।

औद्योगिकीकरण और मशीनीकरण के युग में प्रकृति पर अत्याचार होने लगा है, परिणामस्वरूप पर्यावरण में प्रदूषण, अशुद्ध वायु, जल की कमी, बीमारियों की भरमार दिन-प्रतिदिन एक गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई हैं, जिससे न तो मनुष्य प्रकृति को बचा पा रहा हैं और न ही खुद को । आज  मानव समाज विलासितापूर्ण जीवन की चाह लिए हुए प्रकृति का अति दोहन करता जा रहा हैं!

पर्यावरण संरक्षण में वृक्षों का सबसे अधिक महत्व हैं। जिस तरह आज औद्योगिकीकरण के युग में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, वहाँ आज समाजसेवी संस्थाओं को जन-चेतना को जागृत और प्रोत्साहित करते हुए वृक्षारोपण को एक अनिवार्य गतिविधि बना देना चाहिए, ताकि मनुष्य अपनी विलासिताओं के लोभ में पर्यावरण का दुरूपयोग न कर सकें।

एक बार जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए थे, एक महिला ने उनसे शादी करने की इच्छा जताई. जब स्वामी विवेकानंद ने उस महिला से ये पुछा कि आप ने ऐसा प्रश्न क्यूँ किया?
उस महिला का उत्तर था कि वो उनकी बुद्धि से बहुत मोहित है.और उसे एक ऐसे ही बुद्धिमान बच्चे कि कामना है.
इसीलिए उसने स्वामी से ये प्रश्न कि क्या वो उससे शादी कर सकते है और उसे अपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं?
उन्होंने महिला से कहा कि चूँकि वो सिर्फ उनकी बुद्धि पर मोहित हैं इसलिए कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा
“प्रिये महिला, मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ. शादी करना और इस दुनिया में एक बच्चा लाना और फिर जानना कि वो बुद्धिमान है कि नहीं, इसमें बहुत समय लगेगा. इसके अलावा ऐसा हो इसकी गारंटी भी नहीं है. इसके बजाय, आपकी इच्छा को तुरंत पूरा करने हेतु मैं आपको एक guaranteed सुझाव दे सकता हूँ.
मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें . इस प्रकार आप मेरी माँ बन जाएँगी. और इस प्रकार मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की आपकी इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी.“
महिला अवाक् रह गयी……………….
Moral of the Story :
हम कई बार अप्रत्याशित प्रश्न प्राप्त कर सकते हैं, यह हम पर निर्भर करता है की हम इस स्थिति को कैसे सँभालते हैं और हमारा जवाब कितना सरल होता है.
हज़रत मोहम्मद साहब ने फर्माया ----------- “दरख्त लगाऒ और जब ईनसे मनुष्य फल खायेंगें या जान्वर चारा चरेंगें तो इसका उतना ही सवाब मिलेगा जइसे फल या चारा खिलाकर मिलता है”

Thursday, 8 September 2011

स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (1904-1966) की जीवन-गाथा एक सामान्य व्यक्ति की असामान्य गाथा है। इस व्यक्ति ने अपने प्रारंभिक जीवन में गरीबी की आग की झुलस को झेलते हुए केवल नैतिक सिद्धान्तों के बल पर असाधारण राजनैतिक ऊँचाई हासिल की। शास्त्री जी अपने पीछे न कोई धन-संपत्ति छोड़ गये, न कोई बैंक-बैलेंस। हाँ, हर तरह के भ्रष्टाचार के बोलबाले वाले आज के माहौल में राजनीति का चक्कर चलाने वालों के लिए एक मिसाल जरूर कायम कर गये। क्या आज का राजनेता इससे कुछ सीखना चाहेगा।किसानों को अन्नदाता मानने वाले और देश के सीमा प्रहरियों के प्रति उनके अपार प्रेम ने हर समस्या का हल निकाल दिया. “जय जवान, जय किसान” के साथ उन्होंने देश को आगे बढ़ाया
केवल 19 महीने प्रधानमंत्री रहे शास्त्री जी का कार्यकाल सरगर्मियों से भरा, तेज गतिविधियों का काल था। इस काल के दरम्यान राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय अहमियत के कई सामाजिक तथा राजनैतिक मसलों ने सिर उठाया, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़ा युद्ध भी है! जिस समय वह प्रधानमंत्री बने उस साल 1965 में पाकिस्तानी हुकूमत ने कश्मीर घाटी को भारत से छीनने की योजना बनाई थी. लेकिन शास्त्री जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए पंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगा पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. इस हरकत से पाकिस्तान की विश्व स्तर पर बहुत निंदा हुई. पाक हुक्मरान ने अपनी इज्जत बचाने के लिए तत्कालीन सोवियत संघ से संपर्क साधा जिसके आमंत्रण पर शास्त्री जी 1966 में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए ताशकंद गए. इस समझौते के तहत भारत-पाकिस्तान के वे सभी हिस्से लौटाने पर सहमत हो गया जहाँ भारतीय फौज ने विजय के रूप में तिरंगा झंडा गाड़ दिया था.

इस समझौते के बाद दिल का दौरा पड़ने से 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया. हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर आज तक कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं लाई गई है. उनके परिजन समय-समय पर उनकी मौत पर सवाल उठाते रहे हैं. यह देश के लिए एक शर्म का विषय है कि उसके इतने काबिल नेता की मौत का कारण आज तक साफ नहीं हो पाया आज राजनीति में जहां हर तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है वहीं शास्त्री जी एक ऐसे उदाहरण थे जो बेहद सादगी पसंद और ईमानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे. अपनी दूरदर्शिता की वजह से उन्होंने पाकिस्तान को गिड़गिडाने पर विवश कर दिया था. हालांकि ताशकंद समझौता भारत की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा पर फिर भी उन्होंने दुनिया को भारत की ताकत का अंदाजा दिला दिया था
क्यों इतने लोकप्रिय हैं गांधीजी


दुनिया के किसी भी हिस्से में सत्य और अहिंसा का जिक्र महात्मा गांधी को याद किए बिना पूरा नहीं होता. अब तो उनके बताए रास्ते पर चलने का फैशन भी आम हो गया गया है. आखिर ऐसा क्या है गांधीजी में.

पिछले 100 साल में कम ही लोग ऐसे हैं जिन्हें गांधी जितनी ख्याति मिली. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बापू को तारीख में बांध पाना असंभव है. तरक्की की राह पर हम कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएं गांधी को नकार पाना समय के बस में भी नहीं दिखता. कई लोग आज गांधी के दर्शन को भले ही प्रैक्टिकल न मानें लेकिन उनकी तरफ खुद को खिंचने से कोई नहीं रोक पाता है. चाहे फैशन की चकाचौंध में सराबोर यंगेस्टर्स हों, किताबों में डूबे स्टूडेंट या फिर आईटी प्रोफेशनल्स.

मोबाइल फोन और आई पॉड से लैस कंप्यूटर युग के आज के युवाओं को गांधी कैसे प्रभावित करते है. रेडियो जॉकी गौरव कुमार कहते हैं, "गांधी जी के दर्शन में हर समस्या का आसान उपाय सुझाने की क्षमता है. यही वजह है कि वह बेहद प्रेक्टिकल और रेलेवेंट है."

स्टूडेंटस की शेल्फ में इंजीनियरिंग और मेडिकल की मोटी तगड़ी किताबों के बीच बापू की जीवनी सत्य के साथ प्रयोग का मिलना अब कोई हैरानी की बात नहीं है. आज का प्रयोगधर्मी युवा जिस गहराई में डूबकर माइकल जैक्शन को सुनता है, उतनी ही तल्लीनता से बापू के जीवन से रूबरू भी हो रहा है.

इतना लंबा वक्त बीतने के बाद भी गांधी महज नोटों, सड़कों और इमारतों पर खुदे अपने नाम की वजह से ही याद नहीं किए जा रहे हैं. यह तो उनकी शख्सियत का ही कमाल है जिससे आज भी लोगों के दिल दिमाग में वह अपनी पहचान बरकार रखे हुए हैं. लेकिन युवाओं को उनकी कौन सी बात सबसे ज्यादा पसंद आती है इस पर लगभग हर जुबान से दो ही शब्द सबसे पहले निकलते हैं अहिंसा और सादगी.

वैसे बापू को समझने के लिए किसी साधना की जरूरत नहीं है. बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल करने वालों से लेकर मुन्ना भाई तक वह किसी के भी करीब जा सकते हैं जरूरत है सिर्फ उन्हें समझने की इच्छा जगाने और धैर्य की.
क्यों इतने लोकप्रिय हैं गांधीजी


दुनिया के किसी भी हिस्से में सत्य और अहिंसा का जिक्र महात्मा गांधी को याद किए बिना पूरा नहीं होता. अब तो उनके बताए रास्ते पर चलने का फैशन भी आम हो गया गया है. आखिर ऐसा क्या है गांधीजी में.

पिछले 100 साल में कम ही लोग ऐसे हैं जिन्हें गांधी जितनी ख्याति मिली. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बापू को तारीख में बांध पाना असंभव है. तरक्की की राह पर हम कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएं गांधी को नकार पाना समय के बस में भी नहीं दिखता. कई लोग आज गांधी के दर्शन को भले ही प्रैक्टिकल न मानें लेकिन उनकी तरफ खुद को खिंचने से कोई नहीं रोक पाता है. चाहे फैशन की चकाचौंध में सराबोर यंगेस्टर्स हों, किताबों में डूबे स्टूडेंट या फिर आईटी प्रोफेशनल्स.

मोबाइल फोन और आई पॉड से लैस कंप्यूटर युग के आज के युवाओं को गांधी कैसे प्रभावित करते है. रेडियो जॉकी गौरव कुमार कहते हैं, "गांधी जी के दर्शन में हर समस्या का आसान उपाय सुझाने की क्षमता है. यही वजह है कि वह बेहद प्रेक्टिकल और रेलेवेंट है."

स्टूडेंटस की शेल्फ में इंजीनियरिंग और मेडिकल की मोटी तगड़ी किताबों के बीच बापू की जीवनी सत्य के साथ प्रयोग का मिलना अब कोई हैरानी की बात नहीं है. आज का प्रयोगधर्मी युवा जिस गहराई में डूबकर माइकल जैक्शन को सुनता है, उतनी ही तल्लीनता से बापू के जीवन से रूबरू भी हो रहा है.

इतना लंबा वक्त बीतने के बाद भी गांधी महज नोटों, सड़कों और इमारतों पर खुदे अपने नाम की वजह से ही याद नहीं किए जा रहे हैं. यह तो उनकी शख्सियत का ही कमाल है जिससे आज भी लोगों के दिल दिमाग में वह अपनी पहचान बरकार रखे हुए हैं. लेकिन युवाओं को उनकी कौन सी बात सबसे ज्यादा पसंद आती है इस पर लगभग हर जुबान से दो ही शब्द सबसे पहले निकलते हैं अहिंसा और सादगी.

वैसे बापू को समझने के लिए किसी साधना की जरूरत नहीं है. बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल करने वालों से लेकर मुन्ना भाई तक वह किसी के भी करीब जा सकते हैं जरूरत है सिर्फ उन्हें समझने की इच्छा जगाने और धैर्य की.
उसने कहा तू चोर है, तुम्हारे मंत्रियों ने घोटाले किये और वो भ्रष्ट हैं, इसने जवाब दिया कर्णाटक में तेरा मुख्य मंत्री चोर और भ्रष्ट है उसकी बात करो. इस ने कहा मोदी ने दंगों में जान बूझ कर लोगों को मरने छोड़ दिया , उसने जवाब दिया तुमने भी तो चोरासी के दंगों में सिक्खों को जान बूझ कर दंगाइयों के हाथो मरने दिया. उसने कहा विकिलीक में तुम्हारे वोट के बदले नोट का भंडाफोड़ हुआ है, इसने कहा उसी विकीलिक वालों ने तुम्हारी अमरीका वालों से सान्थगांथ की कलई खोल दी है. पब्लिक को ये बात तो समझ में आती है कि ये सारे ही चोर हैं पर यह नहीं समझ में आता कि स्वीकारोक्ति के बावजूद इनको दण्डित कौन करे और कैसे करे. क्या एक के अपराध करने के बाद दुसरे के द्वारा भी वैसा ही अपराध हो तो सब भरपाई हो जाती है. कैसी राजनीतिक पार्टियाँ हैं ये. ये पार्टियाँ हैं या गुंडे मवालियों के हुजूम जो संसद में बैठ कर चखर-चखर एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं. कैसी यह जनता है हमारी जो इन बदमाशों को चुन कर भेजती है

Wednesday, 7 September 2011

एक बार सरदार किशन सिंह ने अपने खेत में आम के कुछ पौधे लगाए थे। एक दिन वह अपने 3-4 साल के लड़के को साथ लेकर पौधों का मुआयना कर रहे थे । लड़का वहीं खेलने लगा । खेलते-खेलते उसने मिट्टी में कुछ गाड़ा और 2-4 पौधे खड़े कर दिए । यह देख कर पिता ने पूछा, ''यह क्या कर रहे हो ?'' बेटे ने जवाब दिया,'' बदूकें बो रहा हूं, जब ये आप के आमों की तरह बड़ी हो जाएंगी तो इनसे अंग्रेंजो को मारूंगा ।''
यही बालक बाद में सरदार भगत सिंह बना, जिसने अपने जीते जी कभी अंग्रेंजो को चैन से नहीं सोने दिया ।
‎@******10 रुपए का नोट बहुत ज्यादा लगता है जब " गरीब को देना हो ", मगर होटल में बैठे हो तो 1000 भी बहुत कम लगता है *******पूरे दिन मेहनत क बाद gym जाना नही थकता, पर जब अपने ही "माँ- बाप" के पैर दबाने हो तो तंग हो जाते है !*******इस मेसेज को फॉरवर्ड करना बहुत मुश्किल होता है, जब की फ़िज़ूल जोक्स को फॉरवर्ड करना हमारा फ़र्ज़ बन जाता है

जल ही जीवन है


आज भारत ही नही वरण संपूर्ण विश्व मे सबसे बड़ी समस्या है गिरते भू जल स्तर की . आज सभी पानी की समस्या को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है आने वाले समय मे यदि पानी की राशानिंग कर दी जाए तो कोई आश्चर्य ना करेगा और बर्तमान स्थिति को देखते हुए भविष्य मे पानी की पर्याप्त प्रचुरता हो और अगली पीढ़ी को पानी पीने को मिले . आज हम सजग ना हुए तो अगली पीढ़ी हमे माफ़ ना करेगी. जल को संरक्षित करने के लिए उपाय.
भू जल क म है . बदते शहरीकरण के कारण गहरे बोर वेलो के पानी की सतह बहुत नीचे पहुच गयी है उसका पोषण करना बहुत ज़रूरी हो गया है.
कुछ सा दी तकनीको को अपनाकर हम जल को संरक्षित कर सकते है. यह वाटर हावेस्टिंग सिस्टम ही आगामी पीडी को प्यासा मरने से बचा सकती है. अपने घर की छत का पानी का पानी एकत्रित कर अपने बोर वेल को चार्ज कर सकते है इसके कारण आपके घर के आसपास का जल स्तर बढ़ जावेगा. इतना महत्वपूर्ण है की एक घंटे की बारिश आपको एक साल का पानी उपलब्ध करा सकती है.
यदि 1000 फीट की छत है और एक सेंटी मीटर बारिश होती है तो लगभग 1000 लीटर पानी एकत्रित होता है और यदि एक साल मे यदि 40 इंच बारिश होती है तो एक लाख लीटर पानी भू टाल मे जावेगा. इस भू जल की गुणबत्ता भी बढ़ेगी और यह डिसटिल वाटर से भी अधिक शुद्ध होता है .
याद रखे पानी एक एक बूँद क़ीमती है जल ही जीवन है .कृपया जल को सरक्षित करने का संकल्प 

पानी की बरबादी

जो पानी की बरबादी करते हैं, उनसे मैं यही पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने बिना पानी के जीने की कोई कला सीख ली है, तो हमें भी बताए, ताकि भावी पीढ़ी बिना पानी के जीना सीख सके। नहीं तो तालाब के स्थान पर मॉल बनाना क्या उचित है? आज हो यही रहा है। पानी को बरबाद करने वालों यह समझ लो कि यही पानी तुम्हें बरबाद करके रहेगा। एक बूँद पानी याने एक बूँद खून, यही समझ लो। पानी आपने बरबाद किया, खून आपके परिवार वालों का बहेगा। क्या अपनी ऑंखों का इतना सक्षम बना लोगे कि अपने ही परिवार के किस प्रिय सदस्य का खून बेकार बहता देख पाओगे? अगर नहीं, तो आज से ही नहीं, बल्कि अभी से पानी की एक-एक बूँद को सहेजना शुरू कर दो। अगर ऐसा नहीं किया, तो मारे जाओगे। 

Sunday, 4 September 2011

हिंदी राष्ट्रभाषा

आज हमारे देश की आज़ादी के जब लगभग ६३ साल पुरे हो चुके हैं, तब ऐसा लगता है जैसे की हिंदी भाषा के गुलामी के ६३वि वर्षगाँठ मनाई जा रही है, अंग्रेज तो हिन्दुस्तान को आज़ाद छोड़ कर चले गए, लेकिन अपने पीछे हिंदी भाषा को अंग्रेजी का गुलाम बना कर गए! कहने को तो हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, लेकिन आज देश की ५०% जनता अपने दिनचर्या को संपन्न करने में अंग्रेजी का बखूबी इस्तेमाल करती है, हिंदी आये न आये, अंग्रेजी जरुर आती है, कल सुबह मेरे साथ एक दक्षिण भारतीय सज्जन खड़े थे, जब उन्होंने मुझसे बात करनी सुरु की, तब उनकी अंग्रेजी सुन कर मैं समझ गया की ये सज्जन दक्षिण भारतीय हैं, जनाब को अंग्रेजी तो बखूबी आती थी, लेकिन हिंदी में हाँ और ना के अलावा कुछ भी नहीं बोल पाते थे, ये कैसी व्यथा झेल रही है हिंदी?क्या अब यह कहना सही होगा? कि "हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा !" क्या अब ऐसा प्रतीत नहीं होता, कि हिंदी बस नाम             मात्र को ही राष्ट्र भाषा के नाम से जानी जाती आज बच्चे बोलना सीखते हैं तो माता पिता उन्हें पहले अंग्रेजी कि तालीम देना सुरु कर देते हैं,अब आप ही जरा सोचिये, हम अपनी भाषा को भूल कर उसके अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं या फिर अपने ही अस्तित्व को ख़तम कर रहे हैं है

क्या आप सड़क पर गंदगी फैलाते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए आपको अपनी आदतों का निष्पक्ष मुआयना करना होगा। पैदल, सड़क चलते कार का दरवाजा खोलकर पान की पिक थूकते हैं, गंदी पोलिथीन, गुटखे के पाउच और सिगरेट के टुकड़े जहां-तहां फेंकते हैं। ऐतिहासिक स्थलों पर कोयले या चॉक से प्रेम का इजहार करते हैं, किसी भी दीवार को बाथरूम समझ लेते हैं, घर का कूड़ा दूसरों के घर के सामने छोड़ आते हैं तो खुद ही जवाब दीजिए कि ऐसा कैसा प्यार है आपका जो अपने ही प्यारे देश को गंदा और अव्यवस्थित करने पर तुला 

क्या आप मक्कार हैं?

अगर आप अपने काम को बोझ समझते हैं, निरंतर सुधार और बेहतरी की और नहीं बढ़ते हैं तो कोई हक नहीं आपको देशप्रेम के गानों पर झूमने और नाचने का। अगर आप सिर्फ अपने बॉस को दिखाने के लिए काम करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में आप केंटिन की शोभा बढ़ाते हैं या दूसरी टेबलों पर गपियाना आपका प्रिय शगल है तो अप्रत्यक्ष रूप से आप अपने देश का नुकसान कर रहे हैं। 

क्या आप रिश्वत देते या लेते हैं?

अपना काम जल्दी करवाने के लालच में आप पैसे देने से नहीं हिचकिचाते या आप खुद किसी काम को जल्दी करने के लिए ऊपरी आमदनी में विश्वास रखते हैं तो इस प्रश्न के उत्तर के साथ ही आपने अपने देश के सच्चे नागरिक होने का अधिकार खो ‍दिया है। भ्रष्टाचार तमाम बुराइयों की जड़ है। लालच इस भ्रष्टाचार की जननी है। अगर आप किसी भी रूप में इस तरह के काम में शामिल हैं तो देश के लिए कितने ही ऊंचे स्वर में नारे लगा लीजिए सब खोखले हैं। 

आप अगर सचमुच अपने देश को प्यार करते हैं तो इसे भीतर से भी खूबसूरत बनाइए। कर्मों से ऐसे आदर्श रचिए कि भ्रष्टाचार का मूल समाप्त हो सके। एक अकेले अन्ना या किरण बेदी ही क्यों फिक्रमंद हैं देश में लोकपाल बिल लाने के लिए? हम-आप क्यों नहीं नहीं बनते उनकी ताकत? जब हम स्वयं भ्रष्टाचार से दूर होंगे तब ही तो उनका दिल खोलकर साथ दे पाएंगे। 

क्या आम आदमी भ्रष्टाचार नहीं करता?......

अण्णा हजारे को अपार जन समर्थन मिल रहा है। भ्रष्टाचार के ‍खिलाफ लड़ाई में आम आदमी अण्णा के साथ है। लेकिन अण्णा के आंदोलन को जायज करार देने वाला और भ्रष्टाचार को बुराई और बीमारी मानने वाला यह आम आदमी खुद अपने दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार से मुक्त है?

क्या यह आम आदमी छोटे स्तर पर अपने काम निकलवाने के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देता? क्या यह आम आदमी प्रशासन द्वारा निर्धारित भवनकर, जलकर, और अन्य निर्धारित कर अपनी संपत्ति की सही जानकारी देकर भरता है? क्या यह आम आदमी आयकर में छूट लेने की गरज से फर्जी दस्तावेज, नहीं लगाता? क्या यह आम आदमी सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए खुद की आय संबंधित जानकारी नहीं छुपाता है?

अगर आम आदमी अपने दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार में किसी भी स्तर पर लिप्त है तो क्या उसे किसी दूसरे को भ्रष्ट मानने या कहने का अधिकार है?

हो सकता है कि आम आदमी पर ऊपर लगाए गए आरोपों में से कई में वह ईमानदार भी हो, लेकिन यह भी सच है कि व्यवस्था ही इतनी खराब हो चुकी है कि हर आदमी कहीं न कहीं जाने अंजाने में भ्रष्टाचार में शामिल है

भारत के प्रमुख आर्थिक घोटाले

बोफोर्स घोटाला- 64 करोड़ रुपए
यूरिया घोटाला- 133 करोड़ रुपए
चारा घोटाला- 950 करोड़ रुपए
शेयर बाजार घोटाला- 4000 करोड़ रुपए
सत्यम घोटाला- 7000 करोड़ रुपए
स्टैंप पेपर घोटाला- 43 हजार करोड़ रुपए
कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला- 70 हजार करोड़ रुपए
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला- 1 लाख 67 लाख करोड़ रुपए
अनाज घोटाला- 2 लाख करोड़ रुपए

हमारा राष्ट्रीय चरित्र क्या है................

हर व्यक्ति तथा समाज की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है और यही उसका चरित्र भी होता है।' इसी तरह हर देश का भी अपना एक चरित्र होता है जिसे राष्ट्रीय चरित्र कहते है।' और ये चरित्र ही उस देश को दुनिया में अपनी पहचान देता है। ये राष्ट्रीय चरित्र की आत्मा उस देश के हर नागरिक के पास होती है। यही राष्ट्रीय चरित्र व्यक्तिगत स्तर पर देशप्रेम के रूप में प्रकट होता है.
तो अब हम बात करें अपने देश की और स्वयं से ही सवाल करें कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र क्या है??????................
आज देश की जनसँख्या १.२५ अरब है ! क्या इसे रोकने के लिया हमें कोई कानून नहीं बनाना चाहिए ! यह भारत की धरती है कि सबका पेट भर रहा है ! पर हर चीज की सीमा है ! क्या हम बढती हुई आबादी को रोक सकते है 

मोहब्बतें ..


कुछ मोहब्बतें फूलों की तरह होती हैं , ख़ामोश ख़ामोश लेकिन इन की महक इन के होने की पहचान होती है ...
कुछ मोहब्बतें लपकते शोलों की तरह होती हैं के इन में जलने वाले ख़ुद भी जलते हैं और उनके क़रीब रहने वाले भी यह तपिश महसूस करते हैं तो फिर इज़हार की ज़रूरत भी कहाँ रहती है ?
कुछ मोहब्बतों में नदी की सी रवानी होती है ..............................
कुछ टूटने वाले तारों की तरह होती हैं .......................................

कुछ मोहब्बतें क़ुत्बि सितारों की तरह पायेदार और मुस्तक़ल राह दिखाने वाली होती हैं ...
कुछ अंधेरों में रौशनी बन कर जगमगाने वाली मोहब्बतें ...
और कुछ दूर पर्बतों के दामन से फूटने वाले झरनों की तरह ठंडी मीठी, धीमी धीमी शफ़्फ़ाफ़ मोहब्बतें जो जीने का अज़्म अता करती हैं ...!!
हिंदू मिलते हैं, मुसलमान मिलते हैं,
सिक्ख मिलते हैं, क्रिस्तान मिलते हैं,
वह गली, मोहल्ला या सड़क नहीं मिलती,
जहाँ खुद्दार इंसान मिलते हैं

ये भारत है मेरे दोस्त ................

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भारत हमारे देश का नाम है, इसे हम जानते हैं. पर इस भारत के भीतर भी एक भारत है जिसे हम उसके बाह्य रूप से भी अधिक अच्छी तरह जानते तो हैं पर न जानने का दिखावा करते हैं. क्योंकि ये वो भारत है जो हमारी वास्तविकता है हमारी दुखती रग है, पर हम इस असलियत से शुतुरमुर्ग की मुंह चुराते फिर रहे हैं. ये हमारी पुरानी आदत है जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते. मेरा यही प्रयास रहेगा की हम असलियत का सामना करना और अपने प्रति होने वाले अन्याय का प्रतिकार करना सीख जाएँ, यदि एक कदम भी कहीं उठा तो मै स्याम को धन्य मान