शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
दीन अस्त हुसैन, दीने-पनाह हुसैन
सरदाद न दाद दस्त, दर दस्ते-यज़ीद
हक़्क़ा के बिना, लाइलाह अस्त हुसैन
-ख़्वाजा साहब
यह कलाम अजमेर शरीफ़ में हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के मज़ार के पास रोशन होने वाले चिरागों के क़रीब लिखा है...यह कलाम हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती साहब का है....
हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती प्रसिध्द सूफ़ी संत हैं। ख़्वाजा साहब का जन्म मध्य एशिया में सीस्तान कस्बे में नौ 9 रजब 530 हिजरी को हुआ था और 6 रजब 633 हिजरी को उनकी वफ़ात (देहांत) हुई. ख़्वाजा साहब के पूर्वज सीस्तान के संजर कस्बे में रहते थे इसलिए उन्हें संजरी भी कहा जाता है। उनके ख़ानदान के ख़्वाजा इसहाक शामी हिरात के समीप चिश्त कस्बे में आकर रहने लगे थे। इस वजह से उन्हें और उनके शिष्य चिश्ती कहलाए। ख़्वाजा साहब का जीवन प्रेम, मानवता और भक्ति का प्रतीक है। ख़्वाजा के मज़ार की वजह से अजमेर शरीफ दुनियाभर में विख्यात है।
No comments:
Post a Comment